बिहार का संगीत और लोककला – वह सुर जो सदियों से नहीं थमा
Focus Keyword: बिहार शास्त्रीय संगीत लोककला | श्रेणी: संस्कृति एवं कला
बिहार की माटी में सुर रचा-बसा है। यहाँ की हवाओं में ध्रुपद की गंभीरता है, नदियों के किनारे बिरहा की विरह-वेदना गूँजती है और उत्सवों में झूमर-सोहर की मिठास बिखरती है। बिहार को अक्सर केवल इतिहास और राजनीति के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन जो लोग इस राज्य की आत्मा को समझना चाहते हैं, उन्हें पहले इसकी संगीत परंपरा को सुनना होगा। यह लेख उसी सुर की तलाश में निकला एक सफर है।
विषय सूची
- ध्रुपद – भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा
- थुमरी और बिहार का भावनात्मक संगीत
- भिखारी ठाकुर – भोजपुरी के शेक्सपियर
- बिरहा और लोकगायन की परंपरा
- विद्यापति – मिथिला का महाकवि और संगीतकार
- बिहार के प्रमुख संगीत घराने
- आधुनिक दौर में बिहारी कला
- निष्कर्ष
ध्रुपद – भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा
ध्रुपद — यह शब्द सुनते ही एक गहरी, जागृत करने वाली अनुभूति होती है। बिहार की धरती पर ध्रुपद गायन की जड़ें बहुत गहरी हैं। मिथिलांचल के शासकों और मगध के दरबारों में ध्रुपद का विकास हुआ। डागर घराना, जो ध्रुपद गायन का सबसे प्रतिष्ठित घराना है, का सीधा संबंध बिहार की संगीत परंपरा से है। ध्रुपद में आलाप, नोम-तोम और बंदिश के माध्यम से एक ऐसी ध्वनि यात्रा होती है जो सुनने वाले को परमात्मा के करीब ले जाती है। यह संगीत कोई मनोरंजन मात्र नहीं था — यह ध्यान और साधना का एक माध्यम था।
- बिहार में 14 से अधिक प्रमुख लोकसंगीत शैलियाँ प्रचलित हैं
- विद्यापति के 1,000 से अधिक पद आज भी गाए जाते हैं
- भिखारी ठाकुर ने 29 से अधिक नाटक लिखे जो आज भी मंचित होते हैं
- बिहार में संगीत नाटक अकादमी ने 300+ कलाकारों को सम्मानित किया है
थुमरी और बिहार का भावनात्मक संगीत
थुमरी — भारतीय शास्त्रीय संगीत की वह विधा जो भावों को सुरों में पिरोती है — का बिहार से गहरा नाता है। बनारस घराने की थुमरी शैली का विस्तार बिहार के गंगा तटीय क्षेत्रों में हुआ। पटना और भागलपुर के संगीतकारों ने थुमरी को एक नई ऊँचाई दी। थुमरी में कृष्ण-राधा के प्रेम की अभिव्यक्ति, विरह की पीड़ा और भक्ति का उन्माद मिलकर एक अद्भुत संगीत अनुभव बनाते हैं। बिहार के उत्सवों में — चाहे वह छठ हो, विवाह हो या कोई सामाजिक आयोजन — थुमरी की लहरें अनिवार्य रूप से गूँजती हैं।
भिखारी ठाकुर – भोजपुरी के शेक्सपियर
18 दिसंबर 1887 को सारण जिले के कुतुबपुर गाँव में जन्मे भिखारी ठाकुर को "भोजपुरी का शेक्सपियर" कहा जाता है। एक नाई के घर में जन्मे भिखारी ठाकुर ने अपनी रचनात्मकता और साहस से भोजपुरी नाट्य जगत में एक क्रांति ला दी। उनके नाटक "बिदेसिया", "बेटी-बेचवा", "गबरघिचोर" और "राम-लीला" सामाजिक बुराइयों पर सटीक प्रहार करते थे।
"बिदेसिया" नाटक में भिखारी ठाकुर ने उन हज़ारों पुरुषों की पीड़ा को आवाज़ दी जो रोज़ी-रोटी के लिए अपना घर-परिवार छोड़ कलकत्ता या मुंबई चले जाते थे, और पीछे रह जाती थी एक अकेली स्त्री — जिसकी कहानी कोई नहीं सुनता था।
भिखारी ठाकुर की मंडली ने बिहार के गाँव-गाँव में घूमकर नाटक किए। उन्होंने अपनी कला को केवल मनोरंजन नहीं, सामाजिक चेतना का औज़ार बनाया। 1971 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
विद्यापति – मिथिला का महाकवि और संगीतकार
14वीं-15वीं सदी के महाकवि विद्यापति का नाम मैथिली साहित्य और संगीत में उतना ही पूजनीय है जितना कबीर का हिंदी भक्ति साहित्य में। विद्यापति के पद — जिन्हें "पदावली" कहते हैं — शिव और राधा-कृष्ण की भक्ति में रचे गए हैं। इनकी भाषा इतनी मधुर है कि बंगाल के भक्त इन्हें बाँग्ला गीत समझकर गाते थे। आज भी मिथिलांचल में कोई विवाह, पूजा या उत्सव विद्यापति के पदों के बिना अधूरा माना जाता है।
बिरहा और लोकगायन की परंपरा
बिरहा — विरह का गीत — बिहार के भोजपुरी क्षेत्र का एक ऐसा लोकसंगीत रूप है जो देखने में सरल लगता है लेकिन अंदर से बहुत गहरा होता है। बिरहा में गायक घंटों एक रात को जाग-जागकर गाता है — कभी पौराणिक कथाएं, कभी सामाजिक समस्याएं, कभी प्रेम की पीड़ा। बिरहा के प्रमुख गायकों में विंध्यवासिनी देवी और महेंदर मिसिर का नाम अग्रणी है। इसके अलावा पूर्वी (पूर्वांचल का एक गीत शैली), नचारी, झूमर और सोहर बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं।
बिहार के प्रमुख संगीत घराने
बिहार में कई ऐसे संगीत घराने रहे हैं जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को समृद्ध किया। दरभंगा घराना ध्रुपद गायन के लिए विश्वप्रसिद्ध है — यहाँ के मल्लिक परिवार ने सदियों तक ध्रुपद परंपरा को जीवित रखा। पटना घराने ने ठुमरी और खयाल गायन में विशेष योगदान दिया। इन घरानों की पहचान उनकी अनोखी गायकी शैली, विशेष राग प्रस्तुति और पीढ़ियों से चली आ रही गुरु-शिष्य परंपरा में है।
- बिहार संगीत नाटक अकादमी द्वारा वार्षिक पुरस्कार और सम्मान
- पटना विश्वविद्यालय में संगीत विभाग की स्थापना
- CCRT (Centre for Cultural Resources and Training) द्वारा छात्रवृत्ति
- दरभंगा में ध्रुपद संस्थान द्वारा वार्षिक ध्रुपद महोत्सव
- YouTube और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भोजपुरी-मैथिली संगीत का विस्तार
आधुनिक दौर में बिहारी कला
21वीं सदी में बिहार की लोककला एक नई करवट ले रही है। YouTube पर मैथिली और भोजपुरी गायकों के चैनल लाखों subscribers पा रहे हैं। Pawan Singh, Khesari Lal Yadav जैसे भोजपुरी गायक करोड़ों दर्शकों तक पहुँच रहे हैं। वहीं शास्त्रीय परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नई पीढ़ी के गायक ध्रुपद और मैथिली संगीत को अंतर्राष्ट्रीय मंच तक ले जा रहे हैं। बिहार सरकार का "Bihar Cultural Festival" प्रतिवर्ष इन कलाकारों को एक मंच देता है।
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निष्कर्ष
बिहार की संगीत और कला विरासत एक ऐसा महासागर है जिसकी गहराई को पूरी तरह नापा नहीं जा सकता। ध्रुपद की गंभीरता से लेकर भोजपुरी लोकगीतों की हँसी-ठिठोली तक, विद्यापति के भक्तिपद से लेकर भिखारी ठाकुर के सामाजिक नाटकों तक — बिहार की कला परंपरा हर भाव को, हर जीवन अनुभव को समेटती है। इस परंपरा को जानना, सहेजना और आगे बढ़ाना — यह हम सभी की ज़िम्मेदारी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का शेक्सपियर क्यों कहते हैं?
भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी नाटक और गीतों के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य किया। उनके 29 से अधिक नाटक आज भी मंचित होते हैं। जिस तरह शेक्सपियर ने अंग्रेज़ी साहित्य को सामाजिक दर्पण दिया, उसी तरह भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी समाज को।
दरभंगा घराना क्यों प्रसिद्ध है?
दरभंगा घराना ध्रुपद गायन के लिए विश्वप्रसिद्ध है। यहाँ के मल्लिक परिवार ने सदियों तक गुरु-शिष्य परंपरा में ध्रुपद को जीवित रखा। डागर बंधुओं ने इस घराने को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
विद्यापति की रचनाएं किस भाषा में हैं?
विद्यापति की रचनाएं मुख्यतः मैथिली भाषा में हैं। उनकी "पदावली" में शिव स्तुति और राधा-कृष्ण भक्ति के गीत हैं जो आज भी मिथिलांचल में गाए जाते हैं।
बिहार में शास्त्रीय संगीत कहाँ सीखा जा सकता है?
बिहार में दरभंगा का ध्रुपद संस्थान, पटना विश्वविद्यालय का संगीत विभाग, और विभिन्न निजी गुरु-शिष्य संस्थान शास्त्रीय संगीत सिखाते हैं।
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